महाभारत 3.271.24
अथाद्रिशृङ्गमादाय हनूमान्मारुतात्मजःअभिद्रुत्याददे प्राणान्वज्रवेगस्य रक्षसः
athādriśṛṅgamādāya hanūmānmārutātmajaḥabhidrutyādade prāṇānvajravegasya rakṣasaḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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