महाभारत 3.271.5
तद्दृष्ट्वा व्यथनं कर्म कुम्भकर्णस्य रक्षसःउदक्रोशन्परित्रस्तास्तारप्रभृतयस्तदा
taddṛṣṭvā vyathanaṃ karma kumbhakarṇasya rakṣasaḥudakrośanparitrastāstāraprabhṛtayastadā
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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