महाभारत 3.271.8
स महात्मा महावेगः कुम्भकर्णस्य मूर्धनिबिभेद शालं सुग्रीवो न चैवाव्यथयत्कपिः
sa mahātmā mahāvegaḥ kumbhakarṇasya mūrdhanibibheda śālaṃ sugrīvo na caivāvyathayatkapiḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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