महाभारत 3.276.2
मा शुचः पुरुषव्याघ्र क्षत्रियोऽसि परंतपबाहुवीर्याश्रये मार्गे वर्तसे दीप्तनिर्णये
mā śucaḥ puruṣavyāghra kṣatriyo'si paraṃtapabāhuvīryāśraye mārge vartase dīptanirṇaye
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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