महाभारत 3.276.3
न हि ते वृजिनं किंचिद्दृश्यते परमण्वपिअस्मिन्मार्गे विषीदेयुः सेन्द्रा अपि सुरासुराः
na hi te vṛjinaṃ kiṃciddṛśyate paramaṇvapiasminmārge viṣīdeyuḥ sendrā api surāsurāḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
पुस्तक में खोलें