महाभारत 3.41.3
शक्राभिषेके सुमहद्धनुर्जलदनिस्वनम्प्रगृह्य दानवाः शस्तास्त्वया कृष्णेन च प्रभो
śakrābhiṣeke sumahaddhanurjaladanisvanampragṛhya dānavāḥ śastāstvayā kṛṣṇena ca prabho
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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