महाभारत 3.44.3
नन्दनं च वनं दिव्यमप्सरोगणसेवितम्ददर्श दिव्यकुसुमैराह्वयद्भिरिव द्रुमैः
nandanaṃ ca vanaṃ divyamapsarogaṇasevitamdadarśa divyakusumairāhvayadbhiriva drumaiḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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