महाभारत 3.47.8
न तत्र कश्चिद्दुर्वर्णो व्याधितो वाप्यदृश्यतकृशो वा दुर्बलो वापि दीनो भीतोऽपि वा नरः
na tatra kaściddurvarṇo vyādhito vāpyadṛśyatakṛśo vā durbalo vāpi dīno bhīto'pi vā naraḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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