महाभारत 3.55.3
ततोऽब्रवीत्कलिः शक्रं दमयन्त्याः स्वयंवरम्गत्वाहं वरयिष्ये तां मनो हि मम तद्गतम्
tato'bravītkaliḥ śakraṃ damayantyāḥ svayaṃvaramgatvāhaṃ varayiṣye tāṃ mano hi mama tadgatam
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
पुस्तक में खोलें