महाभारत 3.65.37एवमुक्तस्तया राजन्सुदेवो द्विजसत्तमःसुखोपविष्ट आचष्ट दमयन्त्या यथातथम्evamuktastayā rājansudevo dvijasattamaḥsukhopaviṣṭa ācaṣṭa damayantyā yathātathamइस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।पुस्तक में खोलेंयह श्लोक साझा करें