महाभारत 3.69.20
रश्मिभिश्च समुद्यम्य नलो यातुमियेष सःसूतमारोप्य वार्ष्णेयं जवमास्थाय वै परम्
raśmibhiśca samudyamya nalo yātumiyeṣa saḥsūtamāropya vārṣṇeyaṃ javamāsthāya vai param
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
पुस्तक में खोलें