महाभारत 3.69.33
ऋतुपर्णस्तु राजेन्द्र बाहुकस्य हयज्ञताम्चिन्तयन्मुमुदे राजा सहवार्ष्णेयसारथिः
ṛtuparṇastu rājendra bāhukasya hayajñatāmcintayanmumude rājā sahavārṣṇeyasārathiḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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