महाभारत 3.7.3
स तु लब्ध्वा पुनः संज्ञां समुत्थाय महीतलात्समीपोपस्थितं राजा संजयं वाक्यमब्रवीत्
sa tu labdhvā punaḥ saṃjñāṃ samutthāya mahītalātsamīpopasthitaṃ rājā saṃjayaṃ vākyamabravīt
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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