महाभारत 3.7.4
भ्राता मम सुहृच्चैव साक्षाद्धर्म इवापरःतस्य स्मृत्वाद्य सुभृशं हृदयं दीर्यतीव मे
bhrātā mama suhṛccaiva sākṣāddharma ivāparaḥtasya smṛtvādya subhṛśaṃ hṛdayaṃ dīryatīva me
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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