महाभारत 3.7.6
पश्चात्तापाभिसंतप्तो विदुरस्मारकर्शितःभ्रातृस्नेहादिदं राजन्संजयं वाक्यमब्रवीत्
paścāttāpābhisaṃtapto vidurasmārakarśitaḥbhrātṛsnehādidaṃ rājansaṃjayaṃ vākyamabravīt
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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