महाभारत 3.7.7गच्छ संजय जानीहि भ्रातरं विदुरं ममयदि जीवति रोषेण मया पापेन निर्धुतःgaccha saṃjaya jānīhi bhrātaraṃ viduraṃ mamayadi jīvati roṣeṇa mayā pāpena nirdhutaḥइस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।पुस्तक में खोलेंयह श्लोक साझा करें