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महाभारत 3.72.1
दमयन्त्युवाचगच्छ केशिनि जानीहि क एष रथवाहकःउपविष्टो रथोपस्थे विकृतो ह्रस्वबाहुकः
damayantyuvācagaccha keśini jānīhi ka eṣa rathavāhakaḥupaviṣṭo rathopasthe vikṛto hrasvabāhukaḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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