महाभारत 3.73.10
ऋतुपर्णस्य चार्थाय भोजनीयमनेकशःप्रेषितं तत्र राज्ञा च मांसं सुबहु पाशवम्
ṛtuparṇasya cārthāya bhojanīyamanekaśaḥpreṣitaṃ tatra rājñā ca māṃsaṃ subahu pāśavam
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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