महाभारत 3.73.28
बहुशः संपतन्तीं त्वां जनः शङ्केत दोषतःवयं च देशातिथयो गच्छ भद्रे नमोऽस्तु ते
bahuśaḥ saṃpatantīṃ tvāṃ janaḥ śaṅketa doṣataḥvayaṃ ca deśātithayo gaccha bhadre namo'stu te
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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