महाभारत 3.73.4
न चास्य प्रतिबन्धेन देयोऽग्निरपि भामिनियाचते न जलं देयं सम्यगत्वरमाणया
na cāsya pratibandhena deyo'gnirapi bhāminiyācate na jalaṃ deyaṃ samyagatvaramāṇayā
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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