महाभारत 3.80.109
मणिमन्तं समासाद्य ब्रह्मचारी समाहितःएकरात्रोषितो राजन्नग्निष्टोमफलं लभेत्
maṇimantaṃ samāsādya brahmacārī samāhitaḥekarātroṣito rājannagniṣṭomaphalaṃ labhet
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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