महाभारत 3.80.112
यथाशक्ति चरुं तत्र निवेद्य भरतर्षभसर्वकामसमृद्धस्य यज्ञस्य लभते फलम्
yathāśakti caruṃ tatra nivedya bharatarṣabhasarvakāmasamṛddhasya yajñasya labhate phalam
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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