महाभारत 3.80.2
अथापश्यन्महात्मानं देवर्षिं तत्र नारदम्दीप्यमानं श्रिया ब्राह्म्या दीप्ताग्निसमतेजसम्
athāpaśyanmahātmānaṃ devarṣiṃ tatra nāradamdīpyamānaṃ śriyā brāhmyā dīptāgnisamatejasam
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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