महाभारत 3.80.32
अकल्कको निरारम्भो लघ्वाहारो जितेन्द्रियःविमुक्तः सर्वदोषैर्यः स तीर्थफलमश्नुते
akalkako nirārambho laghvāhāro jitendriyaḥvimuktaḥ sarvadoṣairyaḥ sa tīrthaphalamaśnute
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
पुस्तक में खोलें