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महाभारत 3.80.58
दुष्करं पुष्करं गन्तुं दुष्करं पुष्करे तपःदुष्करं पुष्करे दानं वस्तुं चैव सुदुष्करम्
duṣkaraṃ puṣkaraṃ gantuṃ duṣkaraṃ puṣkare tapaḥduṣkaraṃ puṣkare dānaṃ vastuṃ caiva suduṣkaram
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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