महाभारत 3.80.5
प्रतिगृह्य तु तां पूजां नारदो भगवानृषिःआश्वासयद्धर्मसुतं युक्तरूपमिवानघ
pratigṛhya tu tāṃ pūjāṃ nārado bhagavānṛṣiḥāśvāsayaddharmasutaṃ yuktarūpamivānagha
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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