महाभारत 3.80.66अर्चयित्वा पितॄन्देवान्नियतो नियताशनःसर्वकामसमृद्धस्य यज्ञस्य फलमश्नुतेarcayitvā pitṝndevānniyato niyatāśanaḥsarvakāmasamṛddhasya yajñasya phalamaśnuteइस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।पुस्तक में खोलेंयह श्लोक साझा करें