महाभारत 3.80.71
नर्मदामथ चासाद्य नदीं त्रैलोक्यविश्रुताम्तर्पयित्वा पितॄन्देवानग्निष्टोमफलं लभेत्
narmadāmatha cāsādya nadīṃ trailokyaviśrutāmtarpayitvā pitṝndevānagniṣṭomaphalaṃ labhet
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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