महाभारत 3.80.73
चर्मण्वतीं समासाद्य नियतो नियताशनःरन्तिदेवाभ्यनुज्ञातो अग्निष्टोमफलं लभेत्
carmaṇvatīṃ samāsādya niyato niyatāśanaḥrantidevābhyanujñāto agniṣṭomaphalaṃ labhet
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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