महाभारत 3.80.7
अथ धर्मसुतो राजा प्रणम्य भ्रातृभिः सहउवाच प्राञ्जलिर्वाक्यं नारदं देवसंमितम्
atha dharmasuto rājā praṇamya bhrātṛbhiḥ sahauvāca prāñjalirvākyaṃ nāradaṃ devasaṃmitam
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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