महाभारत 3.83.100
रक्षोगणावकीर्णानि तीर्थान्येतानि भारतन गतिर्विद्यतेऽन्यस्य त्वामृते कुरुनन्दन
rakṣogaṇāvakīrṇāni tīrthānyetāni bhāratana gatirvidyate'nyasya tvāmṛte kurunandana
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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