महाभारत 3.83.2
रामस्य च प्रसादेन तीर्थं राजन्कृतं पुरातल्लोहित्यं समासाद्य विन्द्याद्बहु सुवर्णकम्
rāmasya ca prasādena tīrthaṃ rājankṛtaṃ purātallohityaṃ samāsādya vindyādbahu suvarṇakam
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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