महाभारत 3.85.17
अयजद्यत्र कौन्तेय पूर्वमेव पितामहःयत्र भागीरथी पुण्या सदस्यासीद्युधिष्ठिर
ayajadyatra kaunteya pūrvameva pitāmahaḥyatra bhāgīrathī puṇyā sadasyāsīdyudhiṣṭhira
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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