महाभारत 3.9.7
विग्रहो हि महाप्राज्ञ स्वजनेन विगर्हितःअधर्म्यमयशस्यं च मा राजन्प्रतिपद्यथाः
vigraho hi mahāprājña svajanena vigarhitaḥadharmyamayaśasyaṃ ca mā rājanpratipadyathāḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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