महाभारत 3.90.5
भवता चानुगुप्तोऽसौ चरेत्तीर्थानि सर्वशःरक्षोभ्यो रक्षितव्यश्च दुर्गेषु विषमेषु च
bhavatā cānugupto'sau carettīrthāni sarvaśaḥrakṣobhyo rakṣitavyaśca durgeṣu viṣameṣu ca
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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