महाभारत 3.93.8
तत्र ते न्यवसन्वीरास्तपश्चातस्थुरुत्तमम्संतर्पयन्तः सततं वन्येन हविषा द्विजान्
tatra te nyavasanvīrāstapaścātasthuruttamamsaṃtarpayantaḥ satataṃ vanyena haviṣā dvijān
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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