महाभारत 3.97.7
ततो वायुः प्रादुरभूदगस्त्यस्य महात्मनःइल्वलश्च विषण्णोऽभूद्दृष्ट्वा जीर्णं महासुरम्
tato vāyuḥ prādurabhūdagastyasya mahātmanaḥilvalaśca viṣaṇṇo'bhūddṛṣṭvā jīrṇaṃ mahāsuram
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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