महाभारत 4.3.17
साहं ब्रुवाणा सैरन्ध्री कुशला केशकर्मणिआत्मगुप्ता चरिष्यामि यन्मां त्वमनुपृच्छसि
sāhaṃ bruvāṇā sairandhrī kuśalā keśakarmaṇiātmaguptā cariṣyāmi yanmāṃ tvamanupṛcchasi
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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