महाभारत 4.37.4
चलाश्च वाताः संवान्ति रूक्षाः परुषनिःस्वनाःभस्मवर्णप्रकाशेन तमसा संवृतं नभः
calāśca vātāḥ saṃvānti rūkṣāḥ paruṣaniḥsvanāḥbhasmavarṇaprakāśena tamasā saṃvṛtaṃ nabhaḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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