महाभारत 4.48.11
राजानं नात्र पश्यामि गाः समादाय गच्छतिदक्षिणं मार्गमास्थाय शङ्के जीवपरायणः
rājānaṃ nātra paśyāmi gāḥ samādāya gacchatidakṣiṇaṃ mārgamāsthāya śaṅke jīvaparāyaṇaḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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