महाभारत 4.48.3
ततस्तत्सर्वमालोक्य द्रोणो वचनमब्रवीत्महारथमनुप्राप्तं दृष्ट्वा गाण्डीवधन्विनम्
tatastatsarvamālokya droṇo vacanamabravītmahārathamanuprāptaṃ dṛṣṭvā gāṇḍīvadhanvinam
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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