महाभारत 4.51.8
तत्र देवास्त्रयस्त्रिंशत्तिष्ठन्ति सहवासवाःगन्धर्वा राक्षसाः सर्पाः पितरश्च महर्षिभिः
tatra devāstrayastriṃśattiṣṭhanti sahavāsavāḥgandharvā rākṣasāḥ sarpāḥ pitaraśca maharṣibhiḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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