महाभारत 4.55.4
यत्सभायां स्म पाञ्चालीं क्लिश्यमानां दुरात्मभिःदृष्टवानसि तस्याद्य फलमाप्नुहि केवलम्
yatsabhāyāṃ sma pāñcālīṃ kliśyamānāṃ durātmabhiḥdṛṣṭavānasi tasyādya phalamāpnuhi kevalam
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
पुस्तक में खोलें