महाभारत 4.56.10
अहमिन्द्राद्दृढां मुष्टिं ब्रह्मणः कृतहस्तताम्प्रगाढं तुमुलं चित्रमतिविद्धं प्रजापतेः
ahamindrāddṛḍhāṃ muṣṭiṃ brahmaṇaḥ kṛtahastatāmpragāḍhaṃ tumulaṃ citramatividdhaṃ prajāpateḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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