महाभारत 4.57.13शिरसां पात्यमानानामन्तरा निशितैः शरैःअश्मवृष्टिरिवाकाशादभवद्भरतर्षभśirasāṃ pātyamānānāmantarā niśitaiḥ śaraiḥaśmavṛṣṭirivākāśādabhavadbharatarṣabhaइस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।पुस्तक में खोलेंयह श्लोक साझा करें