महाभारत 4.65.8
इन्द्रस्याप्यासनं राजन्नयमारोढुमर्हतिब्रह्मण्यः श्रुतवांस्त्यागी यज्ञशीलो दृढव्रतः
indrasyāpyāsanaṃ rājannayamāroḍhumarhatibrahmaṇyaḥ śrutavāṃstyāgī yajñaśīlo dṛḍhavrataḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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