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महाभारत 4.7.2
स सूदरूपः परमेण वर्चसा; रविर्यथा लोकमिमं प्रभासयन्सुकृष्णवासा गिरिराजसारवा;न्स मत्स्यराजं समुपेत्य तस्थिवान्
sa sūdarūpaḥ parameṇa varcasā; raviryathā lokamimaṃ prabhāsayansukṛṣṇavāsā girirājasāravā;nsa matsyarājaṃ samupetya tasthivān
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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