महाभारत 5.104.9
सप्तर्षीणामन्यतमं वेषमास्थाय भारतबुभुक्षुः क्षुधितो राजन्नाश्रमं कौशिकस्य ह
saptarṣīṇāmanyatamaṃ veṣamāsthāya bhāratabubhukṣuḥ kṣudhito rājannāśramaṃ kauśikasya ha
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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