महाभारत 5.107.8
नैरृतानां सहस्राणि बहून्यत्र द्विजर्षभसृष्टानि प्रतिकूलानि द्रष्टव्यान्यकृतात्मभिः
nairṛtānāṃ sahasrāṇi bahūnyatra dvijarṣabhasṛṣṭāni pratikūlāni draṣṭavyānyakṛtātmabhiḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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