महाभारत 5.113.19
कोशधान्यबलोपेतं प्रियपौरं द्विजप्रियम्प्रजाभिकामं शाम्यन्तं कुर्वाणं तप उत्तमम्
kośadhānyabalopetaṃ priyapauraṃ dvijapriyamprajābhikāmaṃ śāmyantaṃ kurvāṇaṃ tapa uttamam
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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